Friday, March 13, 2020

वो जगह कहाँ मिलेगा

यादों को जोड़कर बनी
पुरानी पर स्पष्ट है
ये जो तेरी तस्वीर है
वो जगह कहाँ मिलेगा
जहा तेरी तस्वीर लगाऊँ

मन तो मौसम की तरह है
बदलता रहता है
मचलता रहता है
तुम बदल ना जाओ
वो जगह कहाँ मिलेगा
जहाँ तेरी तस्वीर लगाऊँ

घर की दीवारें पत्थरों की हैं
मेरे दर्द को छुपाये रहतें हैं
उनके स्पर्श से तुम बदल ना जाओ
तेरी कोमलता को कैसे बचाऊँ
वो जगह कहाँ मिलेगा
जहाँ तेरी तस्वीर लगाऊँ

पलकों पर सजाऊँ
पर ये पलकें आँसुओ में डूबे रहतें हैं
कहीं तुम भींग ना जाओ
वो जगह कहाँ मिलेगा
जहाँ तेरी तस्वीर लगाऊँ |

कुछ तो अनकही सी बात है.....

छुपी तेरे हर एक मुस्कान में
कुछ तो अनकही सी बात है
तू कहती मैं बस यूँ ही अलबेली हूँ
ना बताती तू, बस रखती अपने आप में है
कुछ तो अनकही सी बात है.

पेड़ के झुर्मुट से हवा जब निकलती
लहरें जब साहिल को छूकर धरा पर उतरती
कि तेरे बाल जब तेरे चेहरे पर सिमटती
पर वही खामोशी आज भी है
ना बताती तू,  बस रखती अपने आप में है
कुछ तो अनकही सी बात है

कभी सोचा, ये कैसा श्वेत रंग है,
खुद को मिटा कर देता पहचान हर रंग को
किसी ने सोचा कभी  की
इस चमक के पीछे भी छपी कुछ बात है
ना बताती तू, बस रखती अपने आप में है
कुछ तो अनकही सी, बात है.

सोचती तू बहुत कुछ है
पर बताती नहीं है
पर ये तेरी मुस्कान बहुत कुछ छुपाती नहीं है
ना बताती तू, बस रखती अपने आप में है
कुछ तो अनकही सी, बात है |

एक बहाना

एक बहाना ही सही
जो तुझे करीब ला दे
रूठ जाना ही सही
और तमाम अनोखी कोशिशें
जो मुझे हंसा दे !!

यूँ तो मैं डरती नहीं
पर यूँ डर जाना ही सही
जो तेरा साथ दिला दे !!

एक बहाना ही सही ,
जो तुझे करीब ला दे !!

यूँ ही नाराज़ होना ही सही
जो अधूरेपन का एहसास दिला दे
और तेरी तमाम अनोखी कोशिशें मनाने की
जो मुझे फिर से हँसा दे !!

वो ख्वाब ही सही
जो तुम मुझमें और
मैं तुझमें होने का एहसास दिला दे
तेरे आने की आहट ही सही
जो मुझे फिर से जगा दे !!

एक बहाना ही सही,
जो तुझे करीब ला दे !!

एक जगह मैने बनाया है

किसी ना किसी पल मेरे होने का
जिक्र तो आएगा
दूरी कितनी ही हो
मन तो मुझे बुलाएगा
मेरे शब्द ही दस्तक बन जाएँगे
तुझे नींद से जगाएँगे
गर कभी मेरी पहचान भूलने लगो
तो ये शब्द ही तुझे बताएँगे
एक जगह मैंने बनाया है,
जहाँ कुछ यादें हैं,
जब बोझिल होने लगे मन
तब तुम जाना वहाँ,
यहाँ वही पल मिलेंगे,
जिसे हमने साथ बिताया था.
जब रूठने लगे खुशी तुमसे
तब तुम जाना वहाँ,
यहाँ वही पल मिलेंगे,
जिसने कभी तुम्हे हंसाया था.
जब अंधेरे से निकल ना पाओ,
तब तुम जाना वहाँ,
यहाँ वही रोशनी मिलेगी
जिसने कभी तुम्हे चाँदनी से नहलाया था.
जब थकने लगो जिंदगी से
तब तुम जाना वहाँ,
यहाँ वही ऊर्जा मिलेगी
जिसने पर दिए थे तुम्हे और
आकाश में उड़ाया था.
जब नींद ना आने लगे
तब तुम जाना वहाँ
यहाँ वही ख्वाब मिलेंगे
जिसने तुम्हे कभी सुलाया था.
जब अकेलापन सताने लगे
तब तुम जाना वहाँ
यहाँ मेरे कुछ शब्द गूंजते मिलेंगे
जिसने कभी मन बहलाया था  

Sunday, March 8, 2020

निशा की शांत गलियों में

विदा कर मिहिर को
थकी निष्प्राण धरती पर
सांझ की डोली,
घटाओं के शानों से उतरती है
छनकती चाँदनी के पाजेब से
टूटकर घूँगरू
ख्वाबों के आँगन बिखेरती है..

निशा की शांत गलियों में
स्मृति की फूँक से जब
अंतर्मन सुलगता है
कुछ विप्लवी शब्द
तोड़ देते हैं
हृदय के क़ैदखाने को..

निशा जब धरती पर मचलती है
सुलाकर सारे परिंदो को
ये निशब्द पत्तियाँ
रातभर जुगँनुओं से बातें करती हैं ..

शनैः शनैः सरकती निशा
थकी निष्प्राण लुढ़क कर
पहाड़ी के कोहान पर
सिर टिकाए
भोर की राह तकती है..

उड़ान

लो सहारा उस पवन के वेग का
निस्तेज़ और अद्रिश्य है जो धरा पर
बना दी पगडंडियाँ हैं प्रकृति ने
स्मरण करो स्वयं के अस्तित्व का

बनाकर पंख उसको,
उड़ चलो गगन में
वो है प्रतीक्षा में तुम्हारा
उत्तेजना के लहर से,
विस्मरण करो हर प्रतिबंध का
बस तुम हो,
ये जगत है तुम्हारा
ये जगत है तुम्हारा 

दो पुष्प

पुष्प के भीड़ में दो और भी थे
उल्लास में डूबे हुए
चारो तरफ के शोर में भी
निश्चिन्त स्वयं में खोए हुए
स्वयं से अनजान दो और भी थे ..

निशब्द और निश्च्छल
ताकते रहते एक-दूसरे को
सुबह से शाम तक
फ़र्क भी पड़ता नहीं की
आहट कोई या शोर हो ..

हवा जब उनको हिलाती
जैसे मिल रहे, वो एक ओर से
उनसे उनकी खुशबू चुराती
पागल बने भंवरे सारे
अनवरत ढूँढते उनको हर ओर से ..

ज़िद ने एक दिन मिला तो दिया उनको
टूटकर गिर गये वे,
अनायास जब हवा ने अपना रुख़ बदला,
थे एक-दूसरे से मिले हुए निष्प्राण,
ख़त्म हो गई सारी जद्दो-जहद ..

मिले भी तो यूँ मिले
ना अब कुछ शेष है
वेदना की लहर मचलती अब भी उन वादियों से
आँखे मान ना पाती उनके अंत को
कैसे समझाए उन्हे
अब बस निष्प्राण अवशेष है ..

आत्म मंथन

स्मृति के समंदर में
तुम सीप में छुपे मोती
अनायास उभरी तुम्हारी मुस्कान
दिल ने चाहा छुपा लू अपनी हथेलियो में
पर छूते ही तुम समंदर की गहराइयों में समा गयी

खींच लाई तुम मुझे यूँ
उस असीम समंदर में
और मैं लहरों को अनसूना कर
अनवरत गोते लगाता गया
जैसे कोई पक्षी फँस जाता है शिकारी के जाल में

उस सीप में छुपी तुम
और तुम्हे पाने की चाहत
डूबता गया मैं हर पल
कब किनारे ओझल हो गये
फिर साँसों ने भी हार मान ली
तुम मिली, लेकिन निष्प्राण मुझे

तुम तो जानती थी मुझे तैरना नहीं आता
बस यादों के उजाले ही तो साथ रहने देने की बात थी
गुजरते हुए किसी गली में शाम हो जाती
आह ! अब ना रही ज़िंदगी और ना ही कोई नाता

ये किसने गुंचे को मेरे दरवाज़े पे रख दी
चूमने की ज़िद में खुद को रोक ना पाया
और मैंने काँटों पे ज़ुबान रख दी

अंतर्द्वंद

कल और आज में रोज़ ठनती है
क्या कहूँ,  ज़िंदगी कैसे चलती है
कभी कल की कमी सिसकती है
तो कभी आज की आग सुलगती है
मैं बेचारा, हर क्षण कराहता हूँ
कोई बात असर नहीं करती है,

कल पैदल ही थी सवारी
गाड़ी वाला आज चिढ़ाता है
तुम कल कुछ नहीं थे
अब तो बस आज का पलड़ा  भारी है,

कल जो नहीं था , आज मिल जाए
मैं कल को देकर
कर दूँ हिसाब बराबर
कुछ तो समझो मेरे मन
थोड़ा तो ठहरो मेरे मन
कल भी तो मैं ही था
आज भी तो मैं ही हूँ |

शब्द

मेरे पास शब्द नहीं कुछ कहने के लिए, गया था शब्दों  के शहर कुछ शब्द उधार लेने बाँधी पोटली उसने देने के लिए अचानक , उसने पूछ डाला , क्यूँ चाहि...