Sunday, March 8, 2020

आत्म मंथन

स्मृति के समंदर में
तुम सीप में छुपे मोती
अनायास उभरी तुम्हारी मुस्कान
दिल ने चाहा छुपा लू अपनी हथेलियो में
पर छूते ही तुम समंदर की गहराइयों में समा गयी

खींच लाई तुम मुझे यूँ
उस असीम समंदर में
और मैं लहरों को अनसूना कर
अनवरत गोते लगाता गया
जैसे कोई पक्षी फँस जाता है शिकारी के जाल में

उस सीप में छुपी तुम
और तुम्हे पाने की चाहत
डूबता गया मैं हर पल
कब किनारे ओझल हो गये
फिर साँसों ने भी हार मान ली
तुम मिली, लेकिन निष्प्राण मुझे

तुम तो जानती थी मुझे तैरना नहीं आता
बस यादों के उजाले ही तो साथ रहने देने की बात थी
गुजरते हुए किसी गली में शाम हो जाती
आह ! अब ना रही ज़िंदगी और ना ही कोई नाता

ये किसने गुंचे को मेरे दरवाज़े पे रख दी
चूमने की ज़िद में खुद को रोक ना पाया
और मैंने काँटों पे ज़ुबान रख दी

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