Sunday, March 8, 2020

दो पुष्प

पुष्प के भीड़ में दो और भी थे
उल्लास में डूबे हुए
चारो तरफ के शोर में भी
निश्चिन्त स्वयं में खोए हुए
स्वयं से अनजान दो और भी थे ..

निशब्द और निश्च्छल
ताकते रहते एक-दूसरे को
सुबह से शाम तक
फ़र्क भी पड़ता नहीं की
आहट कोई या शोर हो ..

हवा जब उनको हिलाती
जैसे मिल रहे, वो एक ओर से
उनसे उनकी खुशबू चुराती
पागल बने भंवरे सारे
अनवरत ढूँढते उनको हर ओर से ..

ज़िद ने एक दिन मिला तो दिया उनको
टूटकर गिर गये वे,
अनायास जब हवा ने अपना रुख़ बदला,
थे एक-दूसरे से मिले हुए निष्प्राण,
ख़त्म हो गई सारी जद्दो-जहद ..

मिले भी तो यूँ मिले
ना अब कुछ शेष है
वेदना की लहर मचलती अब भी उन वादियों से
आँखे मान ना पाती उनके अंत को
कैसे समझाए उन्हे
अब बस निष्प्राण अवशेष है ..

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