Sunday, March 8, 2020

अंतर्द्वंद

कल और आज में रोज़ ठनती है
क्या कहूँ,  ज़िंदगी कैसे चलती है
कभी कल की कमी सिसकती है
तो कभी आज की आग सुलगती है
मैं बेचारा, हर क्षण कराहता हूँ
कोई बात असर नहीं करती है,

कल पैदल ही थी सवारी
गाड़ी वाला आज चिढ़ाता है
तुम कल कुछ नहीं थे
अब तो बस आज का पलड़ा  भारी है,

कल जो नहीं था , आज मिल जाए
मैं कल को देकर
कर दूँ हिसाब बराबर
कुछ तो समझो मेरे मन
थोड़ा तो ठहरो मेरे मन
कल भी तो मैं ही था
आज भी तो मैं ही हूँ |

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