Sunday, March 8, 2020

निशा की शांत गलियों में

विदा कर मिहिर को
थकी निष्प्राण धरती पर
सांझ की डोली,
घटाओं के शानों से उतरती है
छनकती चाँदनी के पाजेब से
टूटकर घूँगरू
ख्वाबों के आँगन बिखेरती है..

निशा की शांत गलियों में
स्मृति की फूँक से जब
अंतर्मन सुलगता है
कुछ विप्लवी शब्द
तोड़ देते हैं
हृदय के क़ैदखाने को..

निशा जब धरती पर मचलती है
सुलाकर सारे परिंदो को
ये निशब्द पत्तियाँ
रातभर जुगँनुओं से बातें करती हैं ..

शनैः शनैः सरकती निशा
थकी निष्प्राण लुढ़क कर
पहाड़ी के कोहान पर
सिर टिकाए
भोर की राह तकती है..

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